051 कामना पिशाचिनी
देखो! नरक के तीन रास्ते हैं। माने दुख के तीन ही प्रमुख कारण हैं- काम, क्रोध और लोभ।
इन तीनों में काम ही मुख्य कारण है, क्योंकि कामना ही माँ है, क्रोध और लोभ इसी के दो पुत्र हैं। कैसे?
ध्यान दो। तुमने कामना की, अब दो में से एक बात होगी ही। या तो कामना पूरी होगी, या नहीं होगी।
कामना पूरी न हुई तो "क्रोध" पैदा होगा। आखिर क्रोध तो तभी आता है जब किसी इच्छा में बाधा आ जाती है। अगर किसी की प्रत्येक कामना पूरी होती रहे तो उसे कभी भी क्रोध आए ही क्यों?
दूसरे, अगर कामना पूरी हो जाए तो जो सुख पाया वह निरंतर मिलता ही रहे, छूट न जाए, बना रहे, ऐसा "लोभ" पैदा होगा।
कोई नरक की, दुख की संभावना ही समाप्त करना चाहे, तो उसे इस कामना पिशाचिनी का ही गला काट देना चाहिए। अगर एकबार यह कामना ही मिट जाए, तो न पूर्ति की चिन्ता रहे, न भविष्य का चिन्तन रहे, न किसी बाधा का भय रहे, न तनाव, उद्वेग, उहापोह और उधेड़बुन रहे। तब संसार में कोई ताकत नहीं है कि तुम्हें दुखी कर दे। है ना गजब बात।
तो देर किस बात की है? कह दो अपने मन से कि "अ मन! अब तूं कामना ही करना छोड़ दे। इसी में सुख है, चैन है, और इसी में आराम है। अब तूं भिखारियों की तरह दरवाजे दरवाजे माथा मत पटक और संतोष के राजसिंहासन पर बैठ जा। तब बड़े बड़े राजाओं, महाराजाओं का सुख भी तेरे सुख के सामने फीका पड़ जाएगा।"
और यह कठिन नहीं है, सरल है। कठिनता तो निरंतर कोई न कोई कामना करते रहने में है। प्रारब्ध से जो मिल जाए उसी में संतुष्ट रहते हुए, अन्य की माँग न करं तो समझो बात सदा सदा के लिए बन गई।
अब विडियो देखें- कामना छूटती नहीं
https://youtu.be/68LwQ2iF0rQ
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