Posts

299 सूर्पनखा की नाक

पंचवटी में सूर्पनखा का बड़ा प्रकोप है। सूर्पनखा वासना है, वही इस जगत के दुखों का एकमात्र कारण है। जो भी दुखी है, समझ लो उससे सूर्पनखा चिपटी है। जो इस देह रूपी पंचवटी में आया, सूर्पनखा ने सब पर डोरे डाले। जो इसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ गया, उसकी नाक कटी, वह मारा गया। वही बचा जिसने सत्संग किया और इसकी ओर झांका तक नहीं। उसने नाक कटवाई नहीं, बल्कि इसी की नाक काट दी। जैसे पढ़ाई पूरी होते ही परीक्षा आती है, राम जी का सत्संग पूरा होते ही सूर्पनखा आ गई। अब कच्चे और सच्चे का भेद मालूम पड़ेगा। सूर्पनखा भेष बदलकर आई है, बहुत बनावट के साथ आई है, क्योंकि भेष बदलना तो लंकावालों की परंपरा ही है, मारीच ने बदला, रावण ने बदला। इससे बचने का उपाय देखें, यह आँख से मन में घुसती है, इसीलिए सच्चे सत्संगी लक्ष्मण जी तुरंत भगवान की ओर देखने लगे। सीता जी ने भी उसे नहीं देखा, वे राम जी के चरणों की ओर देखने लगीं। राम जी सीता जी को ही देखते रहे, उन्होंने भी सूर्पनखा को दृष्टि नहीं दी। माने वासना आक्रमण करे तो भगवान के रूप का चिंतन करें, भगवान के चरणों का आश्रय लें, तब वासना भीतर प्रवेश नहीं कर पाएगी। लोकेशानन्द क...

298 ज्ञान और भक्ति

आज ज्ञान और भक्ति की चर्चा एक साथ, क्योंकि दोनों को लेकर बड़ा झगड़ा झंझट चलता है। ज्ञान में जो अद्वैत है, भक्ति में उसी का नाम अनन्यता है। दोनों कहते हैं "दूसरा नहीं"। ज्ञान में तूं नहीं रहता, भक्ति में मैं नहीं रहता। दोनों में एक ही बचता है। ज्ञान में सब एक समान है। उड़िया बाबा से किसी ने पूछा कि ज्ञान बड़ा या भक्ति? बाबा बोले- भक्ति। क्योंकि ज्ञान में तो छोटा बड़ा होता ही नहीं। ज्ञान वह, जहाँ मान न हो। देखो ज्ञान और ज्ञानाभिमानी में अंतर है। ज्ञान माने जाननेवाला, जो जाना गया वो नहीं। आपने जो जाना वो ज्ञान नहीं। ज्ञान में ज्ञानीपना नहीं है, वह तो स्वयं ज्ञानस्वरूप है, ब्रह्मस्वरूप है। और भक्त वो जो भगवान से विभक्त न हो। माने अलग न रहे, अंतर न रहे, अद्वैत हो जाए। नेत्रों में उनका रूप, कानों में उनकी कथा, मुख में उनका नाम, मन में उन्हीं का आश्रय रह जाए। यहाँ जो ब्रह्ममय है, वहाँ भगवद् मय है। यहाँ मन मैं नहीं रहा, वहाँ मन मेरा नहीं रहा भगवान का हो गया, दोनों में मन से संबंधविच्छेद है। जो मन को संभाल न सके, वह अपना मन किसी ऐसे को दे दे, जो उसे संभाल ले, भगवान को दे दे। भगवान स्व...

297 माया, ब्रह्म और जीव

माया, ईश्वर और जीव के संबंध में बहुत विवाद है, कोई त्रैतवादी तीनों की सत्ता स्वीकार करते हैं, द्वैतवादी जीव और ब्रह्म को अनादि मानते हैं, तो अद्वैत कहता है "जीवो ब्रह्मैव ना परा:" माने ब्रह्म ही है।  "माया ईस न आपु कहुँ जान कहिय सो जीव" तुलसीदास जी के लिखे इस दोहे का अर्थ निष्ठा भेद से भिन्न भिन्न लिया जा सकता है। त्रैतवादी बोले, जो न माया को जाने, न ईश्वर को, न अपने को, वह जीव है। माने तीनों भिन्न हैं। द्वैतवादियों ने कहा, जो माया के ईश, माने मायापति ईश्वर को न जाने, अपने को भी न जाने, वह जीव है। रामानुजाचार्य कहते हैं कि जैसे हाथ शरीर से अलग नहीं है, पर हाथ शरीर नहीं है, ऐसे ही जीव ब्रह्म से अलग नहीं है, पर जीव ब्रह्म नहीं है, ऐसा अंगअंगी न्याय है। लोकेशानन्द का अनुभव कहता है कि जो अपने को मायापति न जाने वह जीव है। है तो ईश्वर ही, पर स्वरूप की विस्मृति हो गई है। अजन्मा अविनाशी, अपने को, अपने में कल्पित, मरणधर्मा देह मानने लगा है, इसीलिए जीव कहला भर रहा है, है नहीं, है तो ब्रह्म ही। बात एक ही है, जैसे कहो कि सब सोने का है, सबमें सोना है या सब सोना है, ऐसे ही, सब पर...

296 वैराग्य

माया के बाद वैराग्य का वर्णन। माया समझ ली, तो राग कैसा? फिर तो स्वाभाविक वैराग्य है। लोकेशानन्द पूछता है कि जब जगत ही मिथ्या है, तब सब मैं और मेरा मिथ्या है, तो कौन, कैसे, क्यों और किसकी कामना करे? मालूम पड़ गया कि रेत ही रेत है, जल है ही नहीं, तब क्यों दौड़ में पड़ें? जान लिया कि सीप है, चाँदी है ही नहीं, तो क्यों माथा पटकना? समस्त दृश्य जगत जिसे स्वप्नवत् हो गया, वह क्योंकर झूठी वस्तु, झूठे सुख के लिए मारा मारा फिरे? अब वैराग्य, त्याग व राग का भेद- जो छोड़ा जाए वो त्याग है, जो छूट जाए वो वैराग्य। केवल तन से छूटा तो त्याग है, मन से छूटा तो वैराग्य। वस्तु में सार मालूम पड़े पर भोग न करें तो त्याग है, वस्तु असार-व्यर्थ मालूम पड़े तो वैराग्य। रागी और वैरागी में दशा का अंतर है, रागी और त्यागी में दिशा का। रागी विचार करता है मैंने इतना जोड़ा, त्यागी विचार करता है मैंने इतना छोड़ा। वस्तु का मूल्य दोनों के मन में है। एक वस्तु की ओर मुंह करके खड़ा है, दूसरा पीठ करके, हैं एक ही सिक्के के दो पहलू। एक वस्तु से सटना चाहता है, दूसरा हटना, एक उसकी ओर दौड़ रहा है, दूसरा उससे दूर दौड़ रहा है, दौड़ दो...

295 माया का निरूपण

लक्ष्मण जी ने चार के बारे में पूछा- माया, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति। राम जी ने सत्संग प्रारंभ किया, बोले- लक्ष्मण! मति, मन और चित लगाकर सुनना। देखो, सत्संग में मति लग जाए तो अज्ञान न रहे, ज्ञान आ जाए। मन लग जाए तो कामना न रहे, वैराग्य आ जाए। और चित लग जाए तो संसार की स्मृति न रहे, भक्ति की प्राप्ति हो जाए। माया- "मैं और मेरा" बस यही माया है। "मैं" दो हैं, सच्चा और झूठा। सच्चा मैं ब्रह्म है, झूठा मैं माया है। जैसे जब आप स्वप्न देखते हैं, तब आप ही स्वप्न देखते भी हैं, आप ही स्वप्न में दिखते भी हैं। कैसा भी स्वप्न क्यों न हो, आपके स्वप्न में आप तो होते ही हैं, आप अपने आपको ही देखते हैं, आप अपने को स्वप्न में न देखो तो स्वप्न हो सकता ही नहीं। तो इन दो "मैं" में, जो देखने वाला "मैं" है वह ब्रह्म है, जो "मैं" दिखता है वह माया है। दूसरे शब्दों में देहाध्यास मुक्त "मैं" ब्रह्म है, देहाध्यास युक्त "मैं" माया है। जाननेवाला, द्रष्टा "मैं" ब्रह्म है। सूक्ष्म का अभिमानी, जाना जानेवाला "मैं" माया है। और जब यह देह...

294 पंचवटी

राम जी आज पंचवटी में आ गए। पंचतत्वों से बनी यह देह ही पंचवटी है। यहाँ जितने प्रकार के देह हैं, सब पंचवटी ही हैं। इन सबमें यह मनुष्य देह रूपी पंचवटी सबसे कीमती भी है, तो इसी में सबसे अधिक माया का विस्तार भी है। यह दुनिया पंच का प्रपंच ही तो है। पंचवटी में ही सती जी को भ्रम हुआ, वे सती से नकली सीता बन गईं। इसी में रावण की बहन सूर्पनखा रूप बदल कर आई। यहीं खर दूषण और त्रिशिरा, चौदह हजार राक्षसों के साथ आए। और भी, यहीं सीताजी छाया सीता हो गईं, मारीच मायामृग बन भगवान की आवाज निकालने लगा।, रावण संतवेश बनाकर सीताजी का हरण कर ले गया, भगवान को भी रोना पड़ा। देखो, हम पंचवटी में ही हैं। यह पंचवटी ही हमारे रहने का स्थान है। हम दो प्रकार के घरों में रहते हैं, हम एक चलते फिरते घर को लेकर, एक खड़े घर में रहते हैं। आप दोनों में आराम से रहो, बस इतनी सावधानी रखना कि इन्हें अपना मत समझना। यह अपने को मिले हैं, अपने हैं नहीं। इनसे आसक्ति मत कर लेना। ये बंधनकारी नहीं हैं, इनसे आसक्ति ही बंधनकारी है। परेशानी यही है कि इनका संग होते ही यह आसक्ति न मालूम कब कहाँ से आ धमकती है। तो पंचवटी के संग से बचने के लिए क्...

293 सुतीक्ष्ण जी को भगवान मिले

ध्यान दें, आपका भगवान को खोजने जाना साधन मार्ग है, भगवान का आपको खोजते आना संबंध मार्ग, समर्पण मार्ग है। साधन वही जो संबंध-समर्पण तक पहुँचा दे। आज सुतीक्ष्ण जी का कोई नहीं रहा, परिवार तो पहले ही नहीं था, गुरु जी थे, उन्होंने भी त्याग दिया। गुरु जी की याद में तड़प रहे थे कि सूचना मिली, भगवान आ रहे हैं। सुतीक्ष्ण जी विचार करने लगे कि दर्शन कैसे हो? व्याकुल होकर कभी इस मार्ग पर दौड़े, कभी उस मार्ग पर, खूब दौड़े, खूब दौड़े, फिर विचार आया, वे तो उसके हैं जिसका उनके सिवा कोई नहीं है।  "एक बानि करुणानिधान की। सो प्रिय जाहि न गति आन की॥" बस रास्ते में ही बैठ गए, रास्ते पर बैठे हैं, रास्ता नहीं छोड़ा। और भी, वे सीधे ही नहीं बैठ गए, पहले दौड़े फिर बैठे हैं। उनका बैठना साधन से उपलब्ध विचार का, समर्पण का फल है, आप पहले से ही बैठें हों, तो अपना बैठना उन जैसा बैठना मत समझ लेना। बस आँखें मुंद गईं। मूंदी नहीं, मुंद गईं। यहाँ बहुत हैं जो जबरदस्ती मूंद कर बैठे हैं। अपने से मुंद गईं, भगवान भीतर आ गए, शरीर रोमाँचित होकर कटहल जैसा हो गया। भीतर भगवान आए तो बाहर भी आ गए, भीतर हों तभी बाहर दिखते हैं...