052 प्रतीक्षा, परीक्षा, समीक्षा
संसारी की कौन कहे, कितने ही साधक भी अविधिपूर्ण चलते हैं। सही विधि से चलते नहीं, फिर कहते हैं उपलब्धि नहीं होती।
एक नियम है कि परीक्षा संसार की करो, प्रतीक्षा परमात्मा की और समीक्षा अपनी करो। हम परीक्षा परमात्मा की करते हैं, प्रतीक्षा सुख की और समीक्षा दूसरों की करते हैं। तभी तो बात नहीं बनती। हद तो यह है कि कोई समझाने से भी नहीं समझता।
देखो, साधक दो प्रकार के होते हैं। एक पैट्रोल जैसे, दूसरे पानी जैसे।
पानी जैसों को लाख समझाओ, लाख पढ़ाओ, लाख उपदेश दो, पूरी माचिस की डिब्बी जला जला के गिरा दो, उनमें कोई आग नहीं लगती, कोई अंतर नहीं आता। ऐसों में चाहे और 98 गुण हों, पर दो कमियाँ रहती ही हैं। एक तो उनमें अपनी बुद्धि नहीं होती और दूसरे की वो मानते नहीं। रावण को देखो, उसे किस किसने नहीं समझाया? वो माना?
पैट्रोल जैसे साधक एक इशारे मात्र से समझ और संभल जाते हैं। और क्षण भर में ज्ञान रूपी अग्नि से धधकने लगते हैं।
देखो! द्रोपदी भरे दरबार में घसीट लाई गई। दु:शासन साड़ी खींचने को खड़ा था। द्रोपदी ने किसी से कुछ कहा तो नहीं, पर कातर दृष्टि से पितामह, अर्जुन आदि की ओर देखा। सबने नजरें झुका दीं। अब वह गुरू जी की ओर देखती है, द्रोणाचार्य जी की ओर।
द्रोणाचार्य जी ने एक बार सिर दाँई ओर किया, एक बार बाँई ओर, फिर ऊपर देख कर एक अंगुली से ऊपर की ओर इशारा किया।
बोला कोई नहीं, और कोई समझा हो न समझा हो, पर द्रोपदी समझ गई, कि उस एक का आश्रय लो, जो समस्त जगत का एकमात्र आश्रय है। यह जगत जिसमें कल्पित है, जो इस संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त है।
द्रोपदी ने तुरंत कन्हैया को पुकारा।
बताओ तो! साड़ी उतरी क्या?
आप कैसे साधक हो? पानी जैसे या पैट्रोल जैसे?
अब विडियो देखें- द्रोपदी की रक्षा
https://youtu.be/BuDjt-JMqZY
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