053 सुनने से बंधन/

सब साधनों का एक मात्र लक्ष्य है मन का भगवदाकार हो जाना।
देखो! एक बड़ी गजब बात है, मन जो देखता सुनता है, उसी का चिंतन करता है और वह जिस का चिंतन करता है, उसी के आकार का हो जाता है। यह निर्विवाद नियम है।
सारी बात मन के उपयोग की है। संसारी मन की इस तदाकारता का दुरूपयोग कर फंस गया है। साधक इसी का सदुपयोग कर पार हो जाता है।
विचार करो, आँख का दरवाजा बंद किया जा सकता है। पर कान पर किवाड़ नहीं है, उस पर तो भीतर से ही अंकुश रखना पड़ता है।
और यह तो आप जानते ही हैं कि कान के पास सुनने को दो ही बातें हैं। भगवान की कथा और संसार की व्यथा। संसार की बात मन को संसार से जोड़कर बंधन प्रगाढ़ कर देती है, भगवान की चर्चा मन को भगवान का बना कर बंधन काट देती है।
इस प्रकार, बंधन और मुक्ति, दोनों सुनने मात्र से ही हो जाते हैं। कोई कुछ अन्य न भी करे, केवल मात्र अपने कान से क्या सुनना है, इसी एक बात पर विशेष ध्यान दे दे, तो मुक्ति दूर नहीं।
तब देर किस बात की है? अभी निर्णय लेना चाहिए कि "मैं जहाँ तक संभव होगा संसार की व्यथा कम से कम और भगवान की चर्चा अधिक से अधिक सुनूंगा।"
किसी विवाद में मत पड़ जाना! लोकेशानन्द किताब से नहीं, अनुभव से बता रहा है। और नहीं तो, सुनते हुए, फिर सुने हुए का मनन करते हुए तो मन भगवदाकार रहता ही है, उस समय तो दूसरी वृत्ति उठती ही नहीं या कम ही उठती है। पाँच दिन प्रयोग करके देखो, वृत्तियाँ बदलने लगतीं हैं, परमात्म् चिंतन बढ़ने लगता है। धीरे धीरे मन भगवान का होकर, भगवान में ही मिल जाता है।
अब विडियो देखें- मुक्ति, भ्रम से मुक्ति
https://youtu.be/dCPtR0MtH44

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