115 गुरू
पहाड़ पर बरसी वर्षा की बूंद, बिना किसी पूर्व योजना के, बिना किसी मानचित्र के, देर सबेर, बहती-लुड़कती, अपनेआप, सागर में मिल ही जाती है। एक बीज, पेड़, फूल, फल बनते बनते, अपने जैसे अनेकानेक बीजों में पुनः परिणत हो ही जाता है।
पशु चलना, रेंगना, उड़ना, तैरना, खाना, और अपनी भाषा, अपने से जान ही जाता है। एक मनुष्य को छोड़ दें तो लगभग शेष सभी को उनके जीवन संबंधी पाठ, प्रकृति से सहज ही उपलब्ध हैं।
पर इस मनुष्य की स्थिति भिन्न है। कितनी ही क्रियाएँ हैं, जो मनुष्य किसी के सिखाने से ही सीखता है। बिना बताए, उसे उनका कुछ अनुमान तक नहीं होता। इसीलिए मनुष्य को किसी सिखाने वाले की अवश्यकता, जरूरी से भी जरूरी है।
यही कारण है कि माता-पिता-पुत्र आदि संबंध पशुओं में भी पाए जाते हैं, यहाँ तक की न्यूनाधिक पति-पत्नी संबंध भी देखने को मिल जाता है, पर एक विशेष संबंध ऐसा है जो केवल और केवल मनुष्यों में ही पाया जाता है, गुरू-शिष्य संबंध।
साधकों को समझना चाहिए कि जो अपनेआप इस बाह्यजगत तक में चलने में समक्ष नहीं है, वह अंतर्जगत की यात्रा पर तो कदम ही कैसे धरे? हमने किसी को देखा, किसी से सुना, किसी से समझा, किसी के अनुभव को पढ़ा, तब कहीं जाकर आध्यात्मिक रहस्यों का अनुमान मात्र हुआ है। अब जब तक किसी पूर्व अनुभवी का सशरीर सानिध्य और मार्गदर्शन न प्राप्त हो जाए, इन्द्रियातीत, आत्मविषयक ज्ञानोपासना संभव ही कैसे हो?
हैरानी नहीं कि आज मनुष्य के पास जो कीमती से कीमती ज्ञान उपलब्ध है, वह न मालूम कितने समय से चली आ रही, इसी गुरू-शिष्य परम्परा का ही अनुग्रह है।
आप और यह लोकेशानन्द धन्य हैं, जो सृष्टि के इस सब से विलक्षण संबंध की डोरी पकड़ कर, किन्हीं परमात्मोप्लब्ध आत्मज्ञानी महात्मा, अपने सद्गुरुदेव भगवान की छत्रछाया में, अपनी यात्रा पर बढ़े चले जा रहे हैं।
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