123 दम
मेरे प्यारे पिताजी! यहाँ ससुराल में रहते हुए मुझे कितना समय हो गया। मुझे मायके की, अपने घर की, बड़ी याद आती है, पर मैं क्या मुंह लेकर आपके पास आऊँ?
क्यों क्या हो गया?
मेरी चुनरी पर दाग लग गया!
"लागा, चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे? घर जाऊँ कैसे?"
मन ही चुनरी है। वासना रूपी मैल ही दाग है। मन मैला हो जाना ही चुनरी पर दाग लग जाना है।
"भूल गई सब बचन बिदा के।
खो गई मैं ससुराल में आ के॥"
मैं परमपिता परमात्मा के घर से चलते हुए, मायके से चलते हुए, पिता जी को जो वचन देकर आई थी, कि संसार रूपी ससुराल में, इस मन रूपी चुनरी पर, माया का दाग नहीं पड़ने दूंगी, मैं वह वचन ही भूल गई।
कितने दुख की बात है, मैं तो इस माया के बाजार में आकर स्वयं ही खो गई। मैंने तो अपनाआपा ही गंवा दिया, स्वरूप ही विस्मृत कर दिया। मैं तो पिताजी से आँख तक मिलाने में सक्षम नहीं हूँ।
"जाके बाबुल से नज़रें मिलाऊँ कैसे?"
न तो यहाँ रहा जाता है, न वहाँ जाया जाता है, क्या करूँ कि यह दाग छूट जाए? कैसे पुनः स्वाभाविक निर्मलता को प्राप्त हो जाऊँ?
यदि आपकी भी ऐसी ही अवस्था है, तो इसका एकमात्र उपाय है "दम", पर दम के लिए दम चाहिए।
आँख टिकती नहीं, जीभ रुकती नहीं, जहाँ चाहे घूमते हैं, जिससे चाहे मिलते हैं, जो जी में आए बोलते हैं, जैसा मन करे खाते हैं, दो मिनट के मौन में बगलें झाँकने लगते हैं, दूसरे की वस्तु देखकर लार टपकाते हैं, दिनरात धन-पद के स्वप्न देखते हैं, किसी की आज्ञा का पालन करते नहीं, किसी के प्रति मन में आदर रखते नहीं, समय की कीमत ध्यान नहीं, पूरा पूरा दिन व्यर्थ की चर्चा में बिताते हैं, चार पैसे कमाने, दो बच्चे और एक घर बनाने में ही अपनी शान समझते हैं, मन में एक पल की भी स्थिरता नहीं, बात "दम" की?
खाओ पर कितना खाना? देखो पर क्या देखना? जाओ पर कहाँ जाना? बोलो पर क्या बोलना? जोड़ो पर किसके लिए जोड़ना? लोकेशानन्द निवेदन करता है कि कुछ तो विचार करो! थोड़ा तो संयम रखो! कहीं तो विराम लगाओ! थोड़ा थोड़ा दम लगाते लगाते "दम" होने लगेगा।
देर न करें, आज अभी संकल्प करें, पिताजी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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